दाऊद का पाँच पत्थर

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पलिश्ति गोलियत को मार गिराने के लिए दाऊद ने नाली से पाँच चिकने पत्थर लिए हुए चला। तो देखिए आपकी द्यान दाऊद की चरवाही का थैली में ले जाता हुँ। उस पाँच पत्थर का संगती पत्थरों के लिए बहुत अच्छा तो लगने लगा पर अपनी इस्तमाल होने की बातों को लेकर जरूर चिंतित रहे होंगे। नदी में इधर-उधर पडा हुआ पत्थरों ने एक जगह पर पहुँच गया। कई वर्षों पहले इन पत्थरों के दशा तो एक अलग ही दशा था। विरूप और बहुत बडे भी थे। किसी रीति से पानी की बहाव में आकर पानी की तेजी के कारण एक जगह से दूसरे जगह की और मजबूरन बहना पडा। पानी के ताकत इन पत्थरों को आगे की ओर खींच निकाल कर ले जाते समय दूसरे पत्थरों पर लगे होंगे और खाई में भी गिरे होंगे। कई वर्षों की यही अनुभव के द्वारा इस पत्थरों की रूप-पूरे बदल गया। कई तुकड़ा में बट गया होंगे। कई पत्थरों में लगने की वजह कुछ-कुछ भाग टूट गिरे भी होंगे। टेस लगा होगा बहुत। निराश ही निराश इन पत्थरों की जीवन में रहा होगा। कई वर्षों की यह अनुभव अब इन पत्थरों को एक अच्छे चिकने पत्थर का रूप दे दिया।

” हमारी जीवन में भी इस तरह कई बातों में गुजरना पड़ा होंगा। तो यह सोचो कि आपको एक अच्छे चिकने पत्थर बनाने, विरूप को हटाकर अच्छा रूप देने, गोफन में इस्तमाल होने क लायक योग्यता देने, निशाने पर ही लगने का लायक बनाने, शत्रु की गमंण्ड को नाश करने के लिए ही प्रभु ने एह अनुभव दी है।”

अब देखो दाऊद ने उस पत्थरों को चुन लिया। अब पत्थरों में चर्चा रह गया की हमें आगे कैसे इस्तमाल किए जाऐंगे। हाँ कुछ न कुछ तो काम के लिए ही चुना होगा। इस थैली चरवाही का है। गोफन इस्तमाल करने वाला दाऊद पहले भी पत्थरों को लेकर इस्तमाल किया होगा। गोफन चलाने का तरीखा सीखने के लिए। सीखते समय दाऊद ने बिन जरूरतों में भी निशान लगाया होगा। कुछ पक्षियों को और जानवरों को पकड़ने एवं भगाने के लिए भी इस्तमाल किया होगा। पर आज इन पत्थरों को चुनने की पीछे बहुत ही बड़ा लक्ष्य है। थैली में चर्चा तेज हो रहा। क्या होगा हमारा इस्तमाल, कौन पहले इस्तमाल किए जाऐंगे, यदि पहला पत्थर के द्वारा ही लक्ष्य पूरा हुआ तो बाकी पत्थरों का भविष्य क्या होगा। सच्च में एक विधान सभा की महसूस यह थैली में रहे होंगे।

“जीवन में कोई लक्ष्य नहीं था। किसी ओर के इसाफ से चलता रहा होगा। पर अनेक अनुभवों में गुज़रकर एक इस्तमाल होने का लायक पत्थर के रूप में बना हुआ हम भी आज प्रभु यीशु के द्वारा उसकी थैली में पहुँच गया है। हमारा चर्चा भी यह ही होगा कि हम कैसे इस्तमाल होंगे। इस गोफन में इस्तमाल हुआ पत्थरों की इस्तमाल ही हमारे जीवन में भी हो करके ऐसा न सोचे पर मुझे एक नया उद्धेश एवं नया इतिहास के लिए इस्तमाल करें। यह प्रार्थना और चर्चा होनी चाहिए हमारी जीवन में। प्रभु की सेवा करने वालों भी यही धीरज हो कि हमें चुना है तो व्यर्त बातों के लिए नहीं परन्तु परमेश्वर की एक नया योजना के लिए है।

अब थैली में पत्थरों का भाषण सुनो। सब का इच्छा यही है कि मैं पहले इस्तमाल हो जाऊं पर आपस में नहीं बोल पाऐंगा। मन में तनाव है कुछ न कुछ तो होगा ही। इन्तजार की घड़ी लंबा हो रहा है। थैली में पाँच पत्थर आपस में यह कहा कि दाऊद क्या सोचकर हमें चुना है। गोलियत के हाथ में तलवार है, ताकत है, सेना है, अनुभव है परन्तु दाऊद के हाथ में बस एक गोफन ओर हम पाँच पत्थर। हमारा अनुभव को देखा जाए तो हम कई साल से अनेक परिस्थितियों में गुजर कर आया है। गोफन से फिसल कर निशाने की और जा सकता है। पर इस्तमाल करने वाला दाऊद को यदि अनुभव नही है तो हमारा चुनाव से कोई मतलब नही है।

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“आपका चुनाव प्रभु यीशु ने अपनी सेवकाई के लिए किया हो या साधारण विश्वासी के रूप में क्यों न हो तो जरूर वो आपको इस्तमाल करेगा। हमें जिसने चुना है वह सर्व शक्तिमान परमेश्वर है। यीशु के प्रति आपका विश्वास है वो ही आपको सफलता देता है।” दाऊद ने अपना हाथ थैली में डाला तब इन पतथरों ने शायद उस हाथ में चड़ने की खोशीष की होगी। सभी पत्थर उस हाथ को देखकर कहा होगा की मुझे चुने। पर कोइ एक पत्थर को यदि दाऊद ने चुना हो तो चुना हुआ पत्थर कभी गमंण्ड नहीं करना चाहिए और दूसरे को कम भी नही समझना चाहीए। बाकी पत्थर दुखी भी नहीं होना चाहिए। यह भी नही बोलना चाहिए कि चुना हुआ पत्थर की निशानी खराब हो और पराजित हो। वरण प्रार्थना करना चाहिए कि मेरा साथी अभी बहुत बड़ा काम के लिए चुना है उन्हें इस्तमाल करें। यही है एक सच्छा विश्वासी का भी कर्तव्य।

हम पत्थरों का लक्ष्य यह नहीं कि हम इस्तमाल हो बल्की शत्रु गोलियत खतम हों। किसी न किसी व्यक्ति के द्वारा परमेश्वर अपना योजना पूरा कर रहा हो तो हम उनके लिए प्रार्थना करें चुना हुआ पत्थर गोलियात को गिराने की इस्तमाल हुआ है तो बाकी चार पत्थर दावूद की वंश से चुना हुआ यीशु की चार सुसमाचार है। जो आज भी शांती की संदेश के रूप में हमारे पास है।
प्रभु हमें आशीष देवें

Author: Pastor George Kuramoottil

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